अर्थशास्त्रियों की मानें तो लिस्ट में भारत के सातवें स्थान पर आने के पीछे अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपए का कमजोर होना रहा। इग्लैंड, फ्रांस ने लगाई ऐसी छलांग कि भारत से छिना दुनिया की पांचवीं अर्थव्यवस्था का ताजतस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। भारत से दुनिया की पांचवीं अर्थव्यवस्था का ताज छिन गया है। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि वैश्विक रैंकिंग में ब्रिटेन और फ्रांस का ओहदा एक-एक पायदान ऊपर उठा है।

विश्व बैंक द्वारा जुटाए गए डेटा के मुताबिक, इन दोनों देशों के बाद मौजूदा समय में भारत दुनिया में सातवें नंबर की अर्थव्यवस्था है। बता दें कि भारत (तकरीबन 18 हजार खरब) के सिर पर यह ताज साल 2017 से सजा था, जबकि कि ब्रिटेन और फ्रांस क्रमशः छठे और सातवें नंबर पर सूची में काबिज थे। डेटा बताता है कि भारत की अर्थव्यवस्था 2018 में महज 3.01 फीसदी (डॉलर्स में) बढ़ी, जबकि 2017 में इसमें 15.27 प्रतिशत का इजाफा हुआ था।

इसी तरह, ब्रिटेन की इकनॉमी में 2018 के दौरान 6.81 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई, जिसमें इससे एक साल पहले केवल 0.75 प्रतिशत का उछाल आया था। वहीं, फ्रांस की अर्थव्यवस्था 2018 में 7.33 फीसदी बढ़ी, जो कि इसके पिछले वर्ष सिर्फ 4.85 प्रतिशत बढ़ोतरी का आंकड़ा ही छू सकी थी।

अर्थशास्त्रियों की मानें तो लिस्ट में भारत के सातवें स्थान पर आने के पीछे अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपए का कमजोर होना रहा। दरअसल, 2017 में यूएस डॉलर की तुलना में रुपए में तीन फीसदी का उछाल था, पर 2018 में भारतीय मुद्रा में पांच प्रतिशत की गिरावट आ गई। यही वजह रही कि भारत की अर्थव्यवस्था डॉलर (अमेरिका) के बरक्स पिछले साल की तुलना से 2018 में धीमी रही।

मालूम हो कि नाममात्र स्थितियों में ही भारतीय अर्थव्यवस्था वित्त वर्ष 2018-19 में 11.2 फीसदी बढ़ी, जबकि 2017-18 में यह 11.3 फीसदी (रुपए में) थी। भारत में वित्त वर्ष हर साल एक अप्रैल से शुरू होता है, जबकि यह 31 मार्च को पूरा होता है। ऐसे में हालिया आंकड़े प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए-2 सरकार के लिए आंखें खोलने वाले हैं, क्योंकि उन्होंने 2020-21 और 2024-25 तक देश की अर्थव्यवस्था को क्रमशः तीन ट्रिलियन डॉलर व पांच ट्रिलियन डॉलर पहुंचाने का लक्ष्य रखा है।

चार जुलाई, 2019 को प्रकाशित इकनॉमिक सर्वे के मुताबिक, 2024-25 तक पांच ट्रिलियन डॉलर आकार वाली अर्थव्यवस्था तक पहुंचने के लिए देश को 12 फीसदी (मौजूदा समय के हिसाब से) की रफ्तार से आगे बढ़ना होगा। हालांकि, विभिन्न अर्थशास्त्रियों के इस पर अलग-अलग मत हैं। कई का कहना है कि इसे हासिल किया जा सकता है, जबकि कुछ का मानना है कि यह लक्ष्य काफी कठिन है।

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